बुन्देलखण्ड को राज्य के रूप में अलग करने की मांग अब जोर पकड़ने लगी है. यदि इतिहास को उठा कर देखा जाए तो पता चलेगा कि बुन्देलखण्ड कोई नया नाम नहीं है. तमाम सारे नामों से इस भूभाग को जाना जाता रहा है. देश की आज़ादी के बाद बुन्देलखण्ड को दो भागों में बाँट कर उत्तर-प्रदेश और मध्य-प्रदेश के साथ मिला दिया गया. आज़ादी के इतने वर्ष बीत जाने के बाद भी यहाँ की जनता को अपने अधिकार नहीं मिल सके हैं. प्रत्येक क्षेत्र में यहाँ के लोगों से भेदभाव किया जाता रहा है. इस भेदभाव का ताज़ा उदहारण तो चौंकाने वाला है. बुन्देलखण्ड विश्विद्यालय, झाँसी की एक प्रवेश परीक्षा का परीक्षा केन्द्र समूचे विश्वविद्यालय की सीमा से बाहर बनाया गया था. क्या किसी भी विश्वविद्यालय में ऐसा होता है कि उसकी परीक्षा किसी अन्य स्थान पर हो?
सरकारी आयोगों में, बार काउंसलिंग में, उच्च सिक्षा आयोग में या इसी तरह के अन्य महत्वपूर्ण विभागों में बुन्देलखण्ड क्षेत्र के लोगों का किसी तरह का प्रतिनिधित्व नहीं होता है, ये पक्षपात नहीं तो और क्या है?
ये तो एक उदहारण है, ऐसे एक नहीं सैकडों उदहारण हैं जो बताते हैं कि इस क्षेत्र के साथ लगातार अन्याय होता आ रहा है. इस क्षेत्र में बालू, हीरा, खनिज पदार्थ अधिसंख्यक रूप से पाया जाता है पर इस क्षेत्र को अपनी सम्पदा का लाभ नहीं मिल पता है. बुन्देलखण्ड द्वारा लगातार करोड़ों, अरबों रुपये राजस्व के रूप में सरकार को दिया जाता है पर बदले में क्या मिलता है, किसानों का भूखों मरना, नौजवानों का घर छोड़ कर महानगरों की ओर पलायन करना, सूखे से लोगों का आत्महत्या करना. सूखे की भयावह स्थिति से अनजान बनी सरकार को जब आन्दोलनों के सहारे जगाया गया तब कुछ लाख रुपये इस क्षेत्र के हिस्से में आए वो भी अफसरशाही के रुतबे में इधर-उधर हो गए. क्या फायदा होगा इस सहायता का ये नहीं सोचा गया बस बुन्देलखण्ड क्षेत्र में सूखा-राहत के नाम पर खाना पूर्ति कर ली गई.
इस विभीषिका के बाद भी जब सरकार ने ध्यान नहीं दिया तो कब ध्यान देगी पता नहीं? अब लगता है कि अलग राज्य की मांग शायद जायज है. कुछ नहीं तो कम से कम हमारी सम्पदा तो हमें ही मिलेगी, हमारे क्षेत्र के युवक अपने बुन्देलखण्ड में तो नौकरी पा सकेंगे, यहाँ का किसान अपनी फसल का अपना लाभ तो पा सकेगा.
मांग उठ रही है आज नहीं तो कल सरकारों को जागना होगा. देर से ही सही पर अलग राज्य बुन्देलखण्ड तो बनाना ही होगा.

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